Tuesday, June 30, 2009

आख़िर कब तक ????


कभी शॉर्ट पिच गेंदों से शिकार...तो कभी आउट स्विगर गेदों से स्लिप और गली में मार...तो कभी फिरकी से ही ढह जाती है...भारतीय बल्लेबाज़ी की मजबूत दीवार...ये विरोधी की चाल में फंसना नहीं तो क्या है...
टीम इंडिया के बल्लेबाजी क्रम का जमैका में वेस्टइंडीज़ में ढह जाना कोई इत्तफाक नहीं ... ये कैरिवियाई टीम की सोची समझी रणनीति की मार है ...और इस रणनीति को कामयाब होने के पीछे हमेशा की तरह टीम इंडिया की आदत शुमार है....
टीम इंडिया के बल्लेबाज़ों का...ऐसा हाल है कि वो विरोधी की चाल में फंस किसी भी अदने से गेंदबाज़ को अपना विकेट थमा बना देते है हीरो...फिर वो गुमनाम चेहरा रामपॉल ही क्यों न हो... अगर टीम इंडिया का एक बल्लेबाज़ नतमस्तक हुआ...तो समझों उस गेदबाज़ की चांदी...क्यों कि उस मुकाबले में उसकी झोली टीम इंडिया के विकेटों से भरनी तय है...
लेकिन ये बात टीम इंडिया के बल्लेबाज़ों को क्यों समझ नहीं आती...क्यों वो बार-बार बन जाते है...विरोधियों की रणनीति का शिकार...
अगर ऐसा नहीं तो फिर ये क्या है...
टी-ट्वेंटी वर्ल्डकप में वेस्टइंडीज़ की शॉर्ट पिच गेदों के हथियार के आगे वर्ल्डक्लास बल्लेबाज़ी धराशाई हो गई...इसी रणनीति के दम पर इंग्लैंड ने भी करो या मरो की जंग में टीम इंडिया को शॉट पिच गेंदों से मार डाला...
खैर उम्मीद थी कि टीम वर्ल्डकप की हार के बाद वेस्टइंडीज़ सीरीज़ में टीम इंडिया कुछ सीखेगी..लेकिन सीखते वो है जिनमें सीखने की चाह हो... .यहां भी यही हाल...कभी शॉर्ट पिच और बाउंसर गेदों का बवाल...तो कभी out स्विंगर्स से स्लीप की मार...विरोधी चक्रव्यूह बनाते रहे ...और अपनी बैटिंग ऑर्डर की कागजी ताकत के नशे में डूबी टीम इंडिया इस च्रकव्यूह में फंसती रही। खैर..जो भी हो...लेकिन इन सबके बीच सवाल ये उठता है...कि अगर विरोधी टीम इंडिया के खिलाफ रणनीति बना सकते है..तो फिर टीम इंडिया अपने दुश्मनों के खिलाफ क्यों नहीं चलती समय रहते कोई चाल ।

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